दिवाली को अपनों का इंतज़ार

दीपावली के त्योहार देश भर में खुशियों का त्योहार होता है. किन्तु उतराखंड में दिवाली का त्योहार और भी खास होता था. उत्तराखंड में दीपावली के मायने सिर्फ दीप पर्व मानना ही नहीं, अपनों के मिलन का त्योहार भी होता था. दिवाली एसा त्योहार होता था, जिसमे गांव छोड़ कर परदेश गए अपनों के घर आने की प्रतीक्षा रहती थी. पहाड़ से जब लोग रोजगार के लिए गांव छोड़कर आते थे तो तब दिवाली पर घर लौटने का वादा घर वालों से करते थे. पहाड़ में दिवाली की प्रतीक्षा बड़ी बेसब्री से रहती थी. गांव में दिवाली सिर्फ दो दिन का त्योहार नहीं, बल्कि इससे पूर्व दो-तीन महीनों से अपनों की प्रतीक्षा से शुरू हो जाता था. लोग दिल थाम कर दिवाली के शुभ दिन का इंतज़ार करते थे. जब दिवाली करीब हो घरों में चहल-पहल और भी बड जाती थी. घरों को सफ़ेद-लाल मिट्टी से लिपाई-पुताई की जाती थी. अपनों का इंतज़ार इस कदर होता था कि मोटर रोड पर हर आने वाली बस-गाडी मानो किसी अपने को लेकर आ गई हो. घर वालों की नजर रास्तों पर आते मुसाफिरों पर लगी रहती थी. परदेश गए व्यक्ति की तब गांव आने की सूचना बस इतनी होती थी की दिवाली को आ रहा हूँ. दिवाली को पहाड़ों में अधिकांश उत्तराखंड प्रवासी घर लौटते थे. ये प्रवासी देश-परदेश के अलावा जंगलात, मसूरी, दिल्ली-बम्बई और रोजीरोटी के लिए अन्य स्थानों से दिवाली को अपने घर आते थे.

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