बच्चों पर भी होता है काम का बोझ

उत्तराखंड के पहाड़ों के बच्चे घर के कामों में भी परिवार का साथ देते थे. रोजमर्रा के घर के कई काम मानों पहाड़ के बच्चों के कन्धों पर होते थे. स्कूल के साथ-साथ, गाय-बैल, पशु चराना तो १० साल के बाद मानों बच्चों का ही काम होता था. जंगलों में पशु चराने के साथ ही खेल-कूद सब “गोर-चराने” के दोरान होते थे. लकड़ों पर केवल गाय-बैल चराने की जिम्मेदारी होती थी. या फिर दूकान से छोटा-मोटा सामान लाने की, लेकिन लड़कियों पर घर की जिम्मेदारी और ज्यादा होती थी. पहाड़ों में लड़कियों के कन्धों पर घर के काम का बोझ बाल उम्र में ही बहुत हो जाता था. घर का खाना बनाने से लेकर, पानी लाना, चोका-चूह्ल़ा भी लड़कियों के भरोषे होता था. १० से १५ साल की लड़कियां घास काटना, जंगलों से घास लाना सीख लेती थी. लड़कियों की स्कूल की शिक्षा से ज्यादा घर के काम की शिक्षा अहम मानी जाती थी. १५ साल के लड़के खेतों में हल लगाना सीख जाते थे. जिन घर में पुरुष घरों में नहीं होते थे वहां १५ साल के बच्चे भी हल हाथों में थाम लेते थे. हल लगाना लड़कों का अनिवार्य काम होता था. पहाड़ की खेतों में हल महिलाएं हल नहीं लगाती थीं. कभी-कभी तो बच्चों के छोटे होने के कारण खेत में बैलों को कोई बड़ा आदमी या महिला “जोत” के देते थे और फिर छोटे बालक हल लगा लेते थे. बच्चों की भी हल में बहुत रूचि रहती थी. हल के बाद खेत में “जोल” (पाटा) लगाना आनन्द दायक होता था.

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